Biography of Louis Pasteur in Hindi, लुई पास्चर की जीवनी, Louis Pasteur jeevni

Biography of Louis Pasteur in Hindi
Biography of Louis Pasteur in Hindi
  • Date of Birth – December 27, 1822
  • Birth Place – Dole, फ्रांस
  • Date Of Death – September 28, 1895 (72 साल की उम्र में), France
  • नागरिकता – फ्रांस
  • Awards (पुरस्कार) :
    • 1881 में Legion of Honor Grand Cross,
    • 1856 में Rumford Medal,
    • 1869 में Foreign Member of the Royal Society
    • 1874 में Copley Medal
    • 1882 में Albert Medal
    • 1883 में Foreign Associate of the National Academy of Sciences
    • 1895 में Leeuwenhoek Medal
    • Order of the Medjidie
  • वैज्ञानिक कैरियर :
    • Fields – Biology, Chemistry, Microbiology
  • Institutions (संस्थानों)
    • École Normale Supérieure, University of Lille, University of Strasbourg, Pasteur Institute
    • Notable students (उल्लेखनीय छात्र) – Charles Friedel (चार्ल्स फ्राइडल)

लुई पास्चर की जीवनी

इस दुनिया में कुछ ऐसे निस्वार्थ मानव सेवा करने वाले महान वैज्ञानिक हमारी पृथ्वी पर जन्मे हैं। जिनका नाम तक अधिकतर व्यक्ति नहीं जानते। लेकिन वास्तविक महान व्यक्तियों की हमारे जीवन में भूमिका कम नहीं कही जा सकती। क्योंकि इन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन बचाएं हैं।

आज मैं आपको एक ऐसे ही महान वैज्ञानिक लुई पाश्चर के बारे में बताता हूं। फ्रांस के एक गांव में चमड़े का व्यापार कर रहे निर्धन व्यापारी की बड़ी तमन्ना थी कि काश वो अच्छे से पढ़ लिख पाता तो किसी बड़े ऑफिस में आराम से कुर्सी पर बैठकर सुकून से ज़िंदगी काट रहा होता। अगर मैं पढ़ लिख लिया होता तो पूरे दिन मरे हुए जानवरों का बदबूदार चमड़ा नहीं उतारना पड़ता। वह व्यापारी अक्सर मन ही मन ऐसा सोचा करता था।

Biography of Louis Pasteur in Hindi

तभी उसे खबर मिली कि उसकी गर्भवती पत्नी ने एक लड़के को जन्म दिया है। यह खबर सुनकर वह चमड़े का व्यापारी बहुत खुश हुआ उसे लगा कि भले ही वह नह पढ़ पाया हो। लेकिन वह अपने बच्चे को जरूर पढ़ा लिखा कर बड़ा अफसर बनाएगा।

लड़का जब 5 साल का हुआ तो वह निर्धन होने के बावजूद भी उसका दाखिला बेहद महंगे विद्यालय में करवाया। किंतु पिता को तो बहुत दुख हुआ जब उन्होंने पाया कि उनका बच्चा पढ़ाई में बेहद कमजोर था। कक्षा के साथी छोटे बच्चे को मंदबुद्धि कहकर उसका मजाक उड़ाते थे।

वैसे तो वह बहुत ही मेहनती था, स्कूल में जाने के साथ-साथ पिता के काम में भी उनका हाथ बटाता था। तभी अचानक से एक घटना घटी। उसके पिता जिस गाँव में रहा करते थे, वह गांव जंगल के बेहद करीब था। और उस जंगल में काफी भेड़िया रहा करते थे।

जंगल से पागल हो चुका एक भेड़िया आया और उसने एक ही दिन में गांव के 8 लोगों को काट लिया है। दिन बीतने के साथ-साथ गांव वालों ने किसी तरह से उस भेड़िए का काम तमाम तो कर दिया। लेकिन उस पागल भेड़िया द्वारा काटे गए 8 लोगों में से 5 लोग अगले कुछ सप्ताह में ही रेबीज का शिकार हो गए।

उन पांचों लोगों के हालात बिल्कुल उस पागल भेड़िया जैसे ही हो गए। वह अजीबोगरीब हरकतें करने लगे। पानी से डरने लगे और अगले कुछ दिनों में ही उनकी तड़प-तड़प कर मौत हो गई।

Louis Pasteur jeevni

बालक लुई ने उन लोगों का तड़पना देखा वह छोटे होने के बावजूद भी हर तरह से उनकी मदद करना चाहते थे । किंतु उन लोगों की मदद एक बालक क्या दुनिया का कोई बड़े से बड़ा डॉक्टर नहीं कर सकता था। क्योंकि हाइड्रोफोबिया पूर्ण रूप से लाइलाज बीमारी है।

गांव वालों के लिए कोई नई बात नहीं थी। अक्सर जंगल से पागल भेड़िया या कोई पागल कुत्ता गांव वालों को काट लेता था। जिसकी वजह से लोगों की मौतें होती रहती थी।

किंतु बालक अपने जीवन में पहली बार देखा था। वह हमेशा अपने पिता से पूछते रहते कि क्यों नहीं उन लोगों को बचाया जा सकता।

उन्हें कोई दवाई देकर ठीक क्यों नहीं किया गया। उस बच्चे के लगातार यह पूछने से उसके पिता एक दिन कहा कि बेटा तुम खुद क्यों नहीं उस बीमारी का इलाज ढूँढते। ख़ूब पढ़ो, नई खोजें करो, अगर तुम दिल लगाकर पढ़ाई करोगे तो इस बीमारी का इलाज भी खोज लोगे।

बस यही बात बालक के दिमाग में घर कर गई उन्हें लगा कि अगर पढ़ाई करने से इस बीमारी का इलाज खोजा जा सकता है। तो मैं रात-दिन पढ़ाई करूँगा और इस तरह से लोगों को नहीं मरने दूंगा। अब लुई ने ध्यान लगाकर पढ़ना शुरू किया जिससे उनके पिता बहुत खुश हुए।

स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद लुई को आगे की पढ़ाई के लिए पिता ने पेरिस भेजा। इन सबके लिए उनके पिता को बहुत बड़ा कर्ज लेना पड़ा था। लुई ने विज्ञान के हर क्षेत्र में पढ़ाई की।

पहले रसायन विज्ञान फिर भौतिकी, 1848 में University of Strasbourg में बतौर chemistry Professor पढ़ाने लगे। किंतु दूसरों को पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने ख़ुद ज्ञान अर्जित करना कभी नहीं छोड़ा और इस दौरान उन्होंने जीव विज्ञान को समझना शुरू किया।

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लूई ने अपने प्रयोगों में पाया की लगभग हर खाने वाले पदार्थ में बेहद ही छोटे कीड़े होते हैं। यह कीड़े इतने छोटे होते हैं कि इनका पता लगाना और इन्हें नग्न आखों से देख पाना संभव नहीं होता। इनको सिर्फ सूक्ष्मदर्शी की सहायता से ही देखा जा सकता है। लुई ने इन कीड़ों को जीवाणु का नाम दिया। इससे पहले जीव विज्ञान के क्षेत्र में जीवाणु जैसे किसी जीव के बारे में कोई भी नहीं जानता था।

Biography of Louis Pasteur
Biography of Louis Pasteur

लुई ने जाना कि इन जीवाणुओं की वजह से ही खाने-पीने की चीजें जल्दी खराब हो जाती है। उन्होंने देखा कि यह जीवाणु अधिक तापमान बर्दाश्त नहीं कर पाते। उन्होंने दूध को 75 डिग्री सेल्सियस पर गर्म करके तुरंत ठंडा किया तो पाया कि अब दूध पहले की तरह जल्दी खराब नहीं होता। क्योंकि गर्म करके ठंडा करने के कारण दूध के सभी जीवाणु मारे गए। वास्तव में दूध के अंदर मौजूद जीवाणु ही दूध को खराब करते थे।

दूध को गर्म करके ठंडा करने की तकनीक को आज भी लुइ पाश्चर के नाम से जाना जाता है, और इसे पाश्चराइजेशन तकनीक कहा जाता है। अब लूई पाश्चर के दिमाग़ में एक विचार आया की जिस तरह से ये जीवाणु खाने-पीने की हर चीजों में पाए जाते हैं, उसी तरह से जीवाणु हमारे शरीर में भी पाए जाते हों। और यही जीवाणु हमें बीमार करते हो। रेबीज के लिए भी यही सूक्ष्म जीवाणु जिम्मेदार हैं।

उन्होंने सोचा अगर किसी तरह से में रेबीज के उन कीड़ों की पहचान करके उन्हें खत्म करने का तरीका समझ लूं। तो संसार को सदा के लिए जानलेवा बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। बस इसके बाद तो लो साहब ने ना रात देखा, ना दिन। उन्हें जहां कहीं किसी रेबीज से पागल हो चुके कुत्ते या भेड़िया देखे जाने की खबर मिलती वह तुरंत वहां पहुंच जाते।

फिर भले ही वह जानवर उन्हें काटकर उन्हें रेबीज का शिकार बनाते, लेकिन वह हर हाल में अपनी जान जोखिम में डालकर उस जानवर को पकड़ते और उसके रक्त की जांच करते। उन्हें ना तो खाने के सुध थी और ना परिवार की। मानवता की भलाई के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी पागल कुत्तों की धरपकड़ को ही समर्पित कर दी।

परिवार की तरफ ध्यान न दिए जाने के कारण उनकी पत्नी उनसे नाराज रहने लगी।किंतु लुई पाश्चर को अपने त्याग का परिणाम मिला। उन्होंने रेबीज के वायरस की पहचान कर ली। उन्होंने जाना की पागल कुत्ते या भेड़िए के शरीर के साथ लार में भी यह वायरस मौजूद होता है। और जब रेबीज से प्रभावित जानवर किसी इंसान या अन्य जानवर को काटता है तो उसके मुंह की लार से निकला रेबीज वायरस घाव के माध्यम से जानवर/इंसान के शरीर में प्रवेश कर जाता है। और उस दूसरे जानवर को भी रेबीज से संक्रमित कर देता है।

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लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती थी कि शरीर के अंदर पहुंच चुके इस वायरस को नष्ट कैसे किया जा सकता है। अब दूध की तरह मानव शरीर को तो उबाला नहीं जा सकता। पाश्चर साहब का यह भली-भांति मानना था कि हमारे शरीर के अंदर सभी प्रकार के रोगों से लड़ने के लिए एक शक्ति छुपी हुई होती है। जिसे हम इम्यून सिस्टम (Immune System) या रोग प्रतिरोधक प्रणाली कहते हैं। लेकिन वह समझ नहीं पा रहे थे कि हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली रेबीज के वायरस से लड़ने में हार क्यों मान जाती है।

तभी उनके किसी दोस्त ने उन्हें अपनी मुर्गियों में फैले गए किसी हैजा जैसे रोग के बारे में बताया। उनके दोस्त ने कहा कि एक-एक करके उनकी सभी मुर्गियाँ मर रही हैं। लुइ पाश्चर ने अपने प्रयोग उन बीमार मुर्ग़ियों के साथ शुरू कर। उन्होंने पाया कि कुछ ऐसे भी जीवाणु या विषाणु होते हैं जो किसी भी जीव की रोग प्रतिरोधक क्षमता को चकमा दे देते हैं।

यानी हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता उस विषाणु से लड़ सकती है और उसे नष्ट भी कर सकती है किंतु वह विषाणु हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता से छुपकर अपना कार्य करता है। तो कैसे इतने होशियार हो चुके विषाणु की पहचान रोग प्रतिरोधक क्षमता से कराई जाए। क्यूँकि अगर एक बार हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस विषाणु को पहचान पाती है, तो निश्चित तौर पर वह उस विषाणु से लड़ भी पाएगी। लेकिन यह सब कैसे होगा। यह सब सोचते-सोचते लूई पाश्चर ने खाना-पीना और सोना तक छोड़ दिया। आखिरकार लुई पाश्चर को सफलता मिली।

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हुआ यह कि मुर्गियों के साथ अपने प्रयोगों के दौरान उन्होंने मर चुकी मुर्गियों के रक्त से उन्हें बीमार करने वाले विषाणु को निकाला और उन विषाणु को एक खास तरह के लवण में डाला। इस लवण के प्रभाव से विषाणु निष्क्रिय हो चुके थे। अब इस लवण का इंजेक्शन उन्होंने उन मुर्गियों को लगाना शुरू किया जो बीमारी से प्रभावित नहीं थी, बल्कि बिल्कुल स्वस्थ थी।

नतीजे हैरान कर देने वाले थे जिन जिन मुर्गियों को इंजेक्शन लगाया गया था। उन्हें आगे चलकर कोई बीमारी नहीं हुई जबकि बाकी की मुर्गियां जिन्हें इंजेक्शन नहीं लगाया गया था। यूं ही बीमारी से प्रभावित होकर मरती रही। लुई साहब का अंदाजा बिल्कुल सही साबित हुआ। असल में जब लवण से निष्क्रिय किए गए विषाणु मुर्गियों के शरीर में गए तो वह विषाणु निष्क्रिय होने की वजह से मुर्गियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाए, और ना ही उन्हें सक्रिय विषाणु की तरह खुद को छुपाना आया और मुर्गियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने उनकी पहचान करके उन्हें ख़त्म करने की शक्ति विकसित कर ली। और उसी शक्ति ने निस्क्रिय और सक्रिय दोनो तरह के विषाणुओं को नष्ट कर दिया।

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अब इस हैजा जैसी बीमारी के विषाणु मुर्ग़ियों के शरीर पर बेअसर हो चुके थे। दोस्तों मानवता के इतिहास में यह बहुत बड़ी खोज थी। इसी खोज को आधार मानकर अगले कुछ दशकों में आनेको प्राण घातक बीमारियों के इलाज विभिन्न खोजकर्ताओं ने ढूंढे।

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लुई पाश्चर ने खुद से उत्साहित होकर जब अपने प्रयोगों को आगे बढ़ाया तो उन्हें अपने बचपन के सपने यानी रेबीज के इलाज को ढूंढने में सफलता मिल गई। उन्होंने रेबीज के वायरस को निष्क्रिय कर के कुत्ते में डाला जिससे उस कुत्ते के शरीर में मौजूद रोग प्रतिरोधक क्षमता ने उस वायरस को पहचान कर उसे बेअसर करने की शक्ति इजाद कर ली। जब उस कुत्ते के शरीर में रेबीज वायरस डाले गए तो भी कुत्ते को रेबीज नहीं हुआ और वह बिल्कुल स्वस्थ रहा। क्योंकि कुत्ते के शरीर ने रेबीज के वायरस से लड़ना सीख लिया था। शुरुआती अनुसंधान के नतीजे बेहद सकारात्मक थे। जिससे लूई पाश्चर ख़ुश और उत्साहित थे।

किंतु यह मानव शरीर पर भी सकारात्मक असर दिखाएंगे इसकी कोई गारंटी नहीं थी। लूई इसी विषय पर अनुसंधान कर ही रहे थे तभी एक महिला अपने बच्चे को लेकर उनके पास रोते हुए आई। महिला ने बताया कि 2 दिन पहले एक पागल कुत्ते ने उसके बच्चे को काटा है। और हर घंटे उसके बच्चे के हालात खराब हो रहे हैं। लुइ पाश्चर ने जांच की तो पाया कि बच्चे को कुत्ते ने बुरी तरह से काट लिया था। जिस कुत्ते ने बच्चे को काटा था लुइ पाश्चर ने किसी तरह से उस कुत्ते को पकड़कर उसकी जांच की तो पाया कि वह कुत्ता रेबीज का शिकार था । यानी अब बच्चा इसका शिकार हो जाएगा।

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लूई साहब ने रेबीज के इलाज को सफलतापूर्वक एक कुत्ते पर आजमा लिया था, किंतु किसी इंसान पर इस इलाज को आजमाना बेहद जोखिम भरा काम हो सकता था। क्योंकि मानव शरीर में रेबीज के प्रति रोग प्रतिरोधक बनाने के लिए रेबीज का ही वायरस बच्चे के शरीर में छोडा जाना था। भले ही वह वायरस निष्क्रिय होता लेकिन फिर भी मानव शरीर में जाकर वह क्या असर करता? इसका किसी को कोई अंदाजा नहीं था।

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बच्चे की माँ, लूई के सामने अपने बच्चे के प्राण बचाने के लिए गुहार लगा रही थी। किंतु लुई साहब के सामने बहुत बड़ा धर्मसंकट था। उनके द्वारा बनाई गयी वैक्सीन अभी शुरुआती स्टेज पर ही थी। अभी उन्हें बहुत सारे प्रयोग करके देखने बाकी थे।

अगर वह बच्चे पर अपना प्रयोग आजमाते और सफल ना हो पाते तो बच्चे के खराब होते हालात का सारा दोष निश्चित रूप से लुइ पाश्चर पर मढ़ दिया जाता। उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता। उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ सकती थी। या फिर बच्चे की मौत भी हो सकती थी। लेकिन वैक्सीन ना आजमाने की स्थिति में भी बच्चे की मौत होना पक्का था। इसलिए लुइ पाश्चर ने वैक्सीन आजमाने का फैसला लिया।

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उन्होंने शुरुआत में कम मात्रा में रेबीज के निष्क्रिय वायरस बच्चे के शरीर में इंजेक्ट किए, फिर वह प्रतिदिन डोज बढ़ाते रहे। ऐसा करते-करते उन्होंने लगातार 21 दिनों तक उस बच्चे को इंजेक्शन दिए, और आखिरकार उन्हें पूरी मानवता की रक्षा करने वाली महान आश्चर्य जनक सफलता मिली। उस बालक को रेबीज नहीं हुआ।

लूई पाश्चर की इस खोज ने मेडिकल की दुनिया में क्रांति ला दी और मानवता को एक बहुत बड़े संकट से बचा लिया। रेबीज दुनिया की सबसे प्राचीन बीमारी मानी जाती है। प्राचीन समय में गुफाओं में भी इस बीमारी से संबंधित चित्रण मिलते रहे हैं।

इस अति प्राचीन बीमारी के इलाज के लिए जब 1885 में लुई पाश्चर ने रेबीज के टीके की खोज की तो उस समय पूरे विश्व की जनसंख्या डेढ़ सौ करोड़ थी। और आपको जानकर हैरानी होगी कि इनमें से हर साल करीब एक करोड़ लोग कुत्तों, भेड़ियों, चमगादड़ आदि द्वारा काटे जाते थे। यह तमाम जानवर रेबीज के प्रमुख जनक हैं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लूई द्वारा इजाद किए गए रेबीज के टीके ने आज तक कितने करोड़ लोगों की जानें बचाई होंगी।

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हालांकि रेबीज हो जाने के बाद उसका कोई इलाज आज भी मुमकिन नहीं है। लेकिन किसी पागल जानवर के काटने के तुरंत बाद से लेकर 3 दिन तक अगर रेबीज का टीकाकरण शुरू हो जाए तो लगभग 100% मौक़ों पर रेबीज हो ही नहीं पाता। इस महान उपलब्धि के बाद लुइ को फ्रांस सरकार ने सम्मानित किया और उनके नाम से पोस्टर संस्थान की स्थापना की गई।

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किंतु लूई पाश्चर समाज का भला करने की धुन में खुद के परिवार का ख्याल नहीं रख पाए। जिस समय वह रेबीज के टीके के लिए अनुसंधान कर रहे थे, उसी दौरान उनकी तीन बेटियों में से दो की मौत ब्रेन ट्यूमर की वजह से हो गई और तीसरी बेटी टाइफाइड का शिकार होकर चल बसी। बच्चियों की मौत के बाद लुइ पाश्चर की पत्नी को अपने पति के सहारे की बहुत जरूरत थी।

लेकिन उन दिनों लूई समाज की भलाई के लिए रेबीज के इलाज को लेकर नित नए प्रयोग करते रहते थे। वह या तो समाज की भलाई के लिए समय निकाल सकते थे या पत्नी के लिए। उन्होंने समाज को चुना, अकेला पड़ जाने के कारण ही उनकी पत्नी मानसिक रोग का शिकार हो गई और कुछ समय बाद लूई का आधा शरीर भी लकवा का शिकार हो चुका था। बावजूद इसके लूई अनुसंधान जारी रखे हुए थे। 73 साल की उम्र में लूई पाश्चर की मृत्यु हो गई।

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बरहाल मानवता की रक्षा में उनका योगदान अतुलनीय है। ऐसे महान वैज्ञानिक को हमारा शत शत नमन। यदि आपको या आपके परिवार या चाहने वालों में से किसी को भी किसी कुत्ते ने काटा है जिस वजह से आपको या आपके चाहने वाले को रेबीज के इंजेक्शन लगवाने पड़े हैं। तो आपको एक बार लूई पाश्चर को हाथ जोड़कर नमन अवश्य करना चाहिए और अपना जीवन बचाने के लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए।

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