बड़े भाई का लालच – हिंदी कहानी

अध्याय 1: प्रारंभिक दिन

गांव का नाम था सनग्रामपुर। वहां एक परिवार रहता था जिसमें तीन सदस्य थे – माता, पिता और उनके दो बेटे। बड़े बेटे का नाम था अजय और छोटे बेटे का नाम था विजय। अजय और विजय में पांच साल का अंतर था। अजय के चेहरे पर हमेशा गर्व और आत्मविश्वास की झलक होती थी, वहीं विजय का चेहरा मासूमियत और विनम्रता से भरा रहता था।

अजय बचपन से ही पढ़ाई में बहुत अच्छा था। उसे हमेशा अपने ऊपर गर्व रहता था कि वह परिवार का सबसे बुद्धिमान सदस्य है। दूसरी ओर, विजय थोड़ा शर्मीला और शांत स्वभाव का था। वह अपने बड़े भाई की तरह तेज नहीं था, लेकिन उसके दिल में हर किसी के लिए जगह थी।

अध्याय 2: पिता की ममता

अजय के बड़े होने के साथ-साथ उसका स्वभाव भी बदलता गया। वह अपने छोटे भाई विजय से ईर्ष्या करने लगा, क्योंकि माता-पिता का अधिक ध्यान विजय पर रहता था। मां अक्सर विजय की मासूमियत और अच्छे स्वभाव की तारीफ करती थीं, जिससे अजय के मन में जलन बढ़ने लगी। पिता हमेशा अपने बच्चों को समान प्रेम देते थे, लेकिन अजय के मन में धीरे-धीरे लालच और ईर्ष्या ने जगह बना ली।

अध्याय 3: जमीन का बंटवारा

समय बीतता गया और एक दिन पिता का स्वास्थ्य अचानक बिगड़ गया। परिवार में चिंता का माहौल था। कुछ महीनों के बाद, पिता ने महसूस किया कि वे ज्यादा दिन जीवित नहीं रह सकते। उन्होंने अपने दोनों बेटों को बुलाया और जमीन और संपत्ति के बंटवारे की बात की।

पिता ने दोनों बेटों को समान हिस्से देने का निर्णय लिया। अजय को घर का बड़ा हिस्सा मिला, जबकि विजय को खेत का बड़ा हिस्सा मिला। अजय को इस बंटवारे में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन उसे यह स्वीकार करना पड़ा।

अध्याय 4: लालच का अंकुर

पिता के गुजरने के बाद, अजय ने अपने हिस्से का घर को बेचने का विचार किया। वह जल्दी से पैसे कमाना चाहता था और शहर में जाकर बसना चाहता था। दूसरी ओर, विजय ने अपने हिस्से का खेत संभालना शुरू किया और दिन-रात मेहनत करके उसे फलने-फूलने लगा। विजय के खेत में जब पहली बार अच्छी फसल हुई, तो गांव में उसकी तारीफ होने लगी।

अजय को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। उसने सोचा, “यह खेत मेरे ही बाप का है, फिर इसे विजय क्यों संभाले?” उसके मन में विजय के प्रति जलन और लालच बढ़ने लगा। उसने सोचा, “अगर मैं इस खेत को हड़प लूं, तो मेरी आर्थिक स्थिति और बेहतर हो जाएगी।”

अध्याय 5: षड्यंत्र की योजना

अजय ने अपनी योजना बनाई। उसने विजय के खेत पर अधिकार करने का तरीका सोचा। उसने गांव के कुछ बदमाशों से मिलकर विजय के खिलाफ साजिश रची। एक रात, अजय ने उन बदमाशों को विजय के खेत में आग लगाने का आदेश दिया। विजय जब अगली सुबह खेत पर पहुंचा, तो उसका दिल टूट गया। उसकी महीनों की मेहनत राख हो चुकी थी।

अध्याय 6: विजय की संघर्ष यात्रा

विजय ने हार नहीं मानी। उसने अपनी मां के आशीर्वाद से और मेहनत करना शुरू किया। उसने गांव के बुजुर्गों और दोस्तों से मदद मांगी। धीरे-धीरे, विजय ने फिर से अपने खेत को खड़ा किया। इस बार उसकी मेहनत और अधिक रंग लाई। गांव के लोग उसकी तारीफ करने लगे।

अजय ने देखा कि विजय अब और अधिक सफल हो रहा है। उसकी ईर्ष्या और भी बढ़ गई। उसने सोचा कि सिर्फ विजय के खेत को बर्बाद करने से काम नहीं चलेगा, उसे विजय को पूरी तरह से समाप्त करना होगा। उसने एक नई साजिश रची।

अध्याय 7: धोखे का जाल

अजय ने अपने पुराने दोस्तों से मिलकर विजय के खिलाफ झूठे आरोप लगाने की योजना बनाई। उसने गांव में अफवाह फैला दी कि विजय ने अपने खेत को सफल बनाने के लिए काले जादू का सहारा लिया है। गांव के लोग जो पहले विजय की तारीफ करते थे, अब उससे डरने लगे। विजय को इन अफवाहों से बहुत दुख हुआ, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी।

अध्याय 8: सत्य की जीत

एक दिन, गांव में एक बुजुर्ग साधु आया। उसने गांववालों से कहा कि सत्य और ईमानदारी की हमेशा जीत होती है। उसने विजय की सच्चाई जानने के लिए गांववालों को प्रोत्साहित किया। साधु ने विजय से पूछा, “तुम्हें किस बात का सबसे ज्यादा दुख है?”

विजय ने साधु से अपनी सारी परेशानियों को बताया। साधु ने उसकी सच्चाई को समझा और गांववालों को भी उसकी सच्चाई का अहसास कराया। धीरे-धीरे, गांव के लोग विजय के प्रति अपनी गलतफहमियों से बाहर आने लगे।

अध्याय 9: बड़े भाई की सजा

अजय की साजिशों का पर्दाफाश हो गया। गांववालों ने अजय से सवाल पूछने शुरू किए। जब उसकी सच्चाई सामने आई, तो सभी गांववाले उससे नाराज हो गए। गांव की पंचायत ने अजय को गांव से निकालने का फैसला किया। अजय ने अपने लालच और ईर्ष्या के कारण अपना सब कुछ खो दिया।

अध्याय 10: विजय की सफलता

विजय ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से गांव में एक नया उदाहरण स्थापित किया। उसकी मां ने उसकी मेहनत और संघर्ष की सराहना की। विजय ने अपने खेत को और भी बढ़ा दिया और गांववालों की मदद से एक नया स्कूल और अस्पताल भी बनवाया। उसकी ईमानदारी और मेहनत की कहानी पूरे गांव में फैल गई।

अंत

अजय का लालच और ईर्ष्या उसे कहीं का नहीं छोड़ सका। उसने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली, जबकि विजय ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से गांव का नाम रोशन किया। इस कहानी से यह सीख मिलती है कि लालच और ईर्ष्या हमेशा बर्बादी की ओर ले जाती है, जबकि सच्चाई और मेहनत हमेशा जीतती है।

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