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राम मंदिर का इतिहास (History of Ram Temple, Ayodhya)

Ram Mandir, Ayodhya

Ram Mandir Case History : अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद भारत में एक राजनीतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दा था, जो दशकों से चला आ रहा था। यह विवाद उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भूमि के एक भूखंड के लिए था। इस जगह में मुग़लों ने मस्जिद बनवा दी थी, लेकिन हिंदुओं का कहना था की यह भगवान राम की जन्मभूमि थी, और पहले यहाँ पर मंदिर था जिसे मुग़लों ने तोड़ कर मस्जिद बनाई थी।

यह मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था जिसे मुग़लों ने तोड़ दिया था और उसी जगह पर बाबरी मस्जिद का निर्माण कर दिया था। मुसलमानों का दावा था कि भूमि उनके नाम पर थी और मीर बाक़ी ने 1528 में प्रथम मुगल सम्राट “बाबर” के आदेश पर इस पर मस्जिद का निर्माण करवाया था।

जानकारी के अनुसार, 1949 में कुछ मुस्लिमों ने मस्जिद में राम की मूर्ति को देखा था। इसके बाद हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने उस जाग पर अपने स्वामित्व का दावा किया इससे विवाद बढ़ गया। इसी कारण सरकार ने इस क्षेत्र को बंद कर अपने कंट्रोल में ले लिया था।

17 दिसंबर 1959 को निर्मोही अखाड़ा ने एक मुकदमा दायर किया और उस भूमि पर अपने स्वामित्व और संरक्षक होने का दावा किया। इसके बाद सुन्नी सेंट्रल बोर्ड ऑफ वक्फ ने भी 18 दिसंबर 1961 को भूमि के स्वामित्व का दावा किया।

बाद में 6 दिसंबर 1992 को कुछ हिंदू कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। इससे पूरे भारत में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे, इन दंगों में कम से कम 2,000 लोगों की जान चली गई थी। मस्जिद का विध्वंस विवाद का विषय बन गया है।

कई वर्षों से यह मामला दोनों समूहों द्वारा देश की विभिन्न अदालतों में लाया गया। लेकिन इसका फैसला नही हो पा रहा था।

30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि अयोध्या में विवादित 2.77 एकड़ भूमि को हिंदू, मुस्लिम और निर्मोही अखाड़े के बीच तीन भागों में विभाजित करके करके तीनों को दे देना चाहिए। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी।

2016 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की नए सिरे से सुनवाई शुरू की। 2017 में SC ने कहा कि मामला संवेदनशील है इसलिए मामले को अदालत से बाहर निपटाने का सुझाव दिया। SC ने पक्षकारों से आपसी बातचीत करने और एक सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने के लिए कहा। हालांकि, आपसी बातचीत से कोई समाधान नहीं हुआ। फिर 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विवाद मामले की सुनवाई के लिए पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन किया और प्रतिदिन सुनवाई शुरू कर दी।

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भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6 अगस्त 2019 से इस मामले पर प्रतिदिन की सुनवाई शुरू की और पक्षकारों के अधिवक्ताओं को अक्टूबर तक तर्क समाप्त करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2019 को अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर सुनवाई पूरी की और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। बाद में 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद का अंत करते हुए अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। शीर्ष अदालत ने सर्वसम्मति से फैसले सुनाते हुए अयोध्या में राम जन्मभूमि ट्रस्ट को 2.77 एकड़ जमीन का मालिकाना हक़ दे दिया, इससे राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया था।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को मुस्लिमों के लिए पाँच एकड़ की एक वैकल्पिक भूमि देने के लिए कहा।और उच्चतम न्यायालय ने सरकार को तीन महीने के भीतर एक योजना तैयार करने और एक ट्रस्ट स्थापित करने के लिए कहा, जो अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करेगा। कुछ समय बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए राम मंदिर निर्माण और प्रबंधन के लिए “श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट” का गठन किया।

अयोध्या विवाद: भारत के पवित्र स्थल का जटिल कानूनी इतिहास

अयोध्या विवाद जो एक सदी से अधिक समय से चला आ रहा था। भारत के अदालतों में चलने वाले सबसे लम्बे केस में से एक है। यह धार्मिक, सामाजिक मुद्दा होने के साथ राजनीति के केंद्र में भी था।

हिंदुओं का मानना है कि उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग के शहर अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था और रामायण में बताई गई अयोध्या यही है। मुसलमानों का कहना था कि उन्होंने पीढ़ियों से वहां नमाज अदा की है। सुप्रीम कोर्ट ने अब फैसला सुनाते हुए उस भूमि को राम मंदिर निर्माण के लिए दे दिया है।

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हिंदू धर्म भारत का बहुत पुराना धर्म है और माना जाता है कि यह 4,000 साल से अधिक पुराना है। भारत का पहला इस्लामिक राजवंश 13वीं शताब्दी की शुरुआत में स्थापित किया गया था।

राम मंदिर – बाबरी मस्जिद विवाद वास्तव में क्या है?

राम मंदिर – बाबरी मस्जिद विवाद वास्तव में 1992 में पूरे देश में एक धार्मिक दंगे के रूप में सामने आया था, इससे पहले इस केस के बारे में ज़्यादा जानकारी लोगों को नही थी। 1992 में हिंदू कारसेवकों की भीड़ द्वारा बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था, इससे पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे और लगभग 2000 लोग मारे गए थे।

हिंदुओं का मानना है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण वास्तव में एक हिंदू मंदिर को तोड कर उसके खंडहर पर किया गया था। हिंदू मंदिर को मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था।

मुसलमानों का कहना है कि उन्होंने दिसंबर 1949 तक मस्जिद में नमाज अदा की, तभी मस्जिद में राम की मूर्ति दिखी इसके बाद हिंदू, मूर्ति की पूजा करने लगे। यही से राम मंदिर – बाबरी मस्जिद विवाद ज़ोर पकड़ता गया।

इसके बाद दशकों तक, दोनों धर्म के कई पक्षकार कई बार अदालत गए लेकिन इसका सर्वमान्य फैसला नही हो पाया था।

क्या अब राम मंदिर – बाबरी मस्जिद मामला खत्म हो गया है?

इस विशेष मामले में तीन प्रमुख पक्षकार थे – दो हिंदू समूह और मुस्लिम वक्फ बोर्ड, जो भारत में इस्लामी संपत्तियों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार हैं।

हिंदू पक्षकारों में हिंदू महासभा, राजनीतिक दल और निर्मोही अखाड़ा है, जो हिंदू संतों का एक संप्रदाय है। मस्जिद के ढहने के एक दशक बाद 2002 में इन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक केस दायर किया।

सितंबर 2010 में उस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय फैसला सुनाते हुए कहा कि विवादित भूमि के 2.77 एकड़ भाग को तीन भागों में समान रूप से विभाजित करके तीनों पक्षकारों को दे दिया जाए। अदालत ने फैसला दिया कि साइट को विभाजित किया जाना चाहिए, जिसमें मुस्लिम समुदाय को एक तिहाई, हिंदुओं को एक तिहाई और निर्मोही अखाड़ा को शेष हिस्सा दे देना चाहिए। इसमें मुख्य विवादित खंड का नियंत्रण, जहां पहले मस्जिद थी, हिंदुओं को दी गई थी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के राम मंदिर फैसले में तीन प्रमुख बातें भी की गई थी –

मिले सबूतों के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ये साबित हो चुका था की विवादित जगह भगवान राम की जन्मभूमि है। साथ ही बाबरी मस्जिद एक हिंदू मंदिर के विध्वंस के बाद बनाई गई थी और यह इस्लाम के सिद्धांतों के अनुसार नहीं बनाया गया था।

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हालाँकि हिंदू और मुस्लिम दोनों समूहों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को मानने से इंकार कर दिया था। इसके बाद दोनों पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, 2011 उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को निलंबित कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की एक रिपोर्ट का हवाला देते बताया ध्वस्त की गई बाबरी मस्जिद के ढांचे के नीचे एक इमारत “जो इस्लामिक नहीं थी” के अवशेष थे। सबूत के तौर पर ASI की रिपोर्ट को आधार बनाकर उच्चतम न्यायालय ने विवादित भूमि का फैसला राम मंदिर के पक्ष में दिया।

राम मंदिर – बाबरी मस्जिद केस की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सर्वसम्मती से फैसले सुनाते हुए कहा की विवादित भूमि हिंदुओं को भगवान राम के मंदिर निर्माण के लिए दी जयेगी, जबकि मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए कहीं और जमीन दी जाएगी।

इसके बाद केंद्र सरकार को राम मंदिर के निर्माण के निर्माण, प्रबंधन और देखरेख के लिए एक ट्रस्ट स्थापित करने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने कहा कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस कानून के शासन के खिलाफ था। इसलिए जिन लोगों ने मस्जिद का विध्वंस किया था। उनके ख़िलाफ केस की सुनवाई जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला हिंदुओं के पक्ष में आने के बाद मुस्लिम पक्षकारों के मुख्य समूह ने कहा है कि वह फैसले के खिलाफ अपील नहीं करेंगे।

अन्य महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम क्या हैं?

1994 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि मस्जिद की अवधारणा इस्लाम में अभिन्न नहीं है। अप्रैल 2018 में, वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने शीर्ष अदालत के समक्ष एक याचिका दायर की, जिसमें न्यायाधीशों से इस बात पर पुनर्विचार करने के लिए कहा गया। लेकिन कुछ महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से मना कर दिया। इसका कारण था की फैसले से धार्मिक तनाव बढ़ने की आशंका थी।

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